Monday, July 14, 2025

भारत में सभी के निशाने पर क्यों हैं ब्राह्मण ? Why are Brahmins the target of everyone in India?

 

 

 

भारत में ब्राह्मण सभी के निशाने पर क्यों हैं ?

 - डा. हरीश चंद्र लखेड़ा  ( Dr. Harish Chandra Lakhera )

भारत में ब्राह्मण सभी के निशाने पर क्यों हैं? 

यह प्रश्न आज केवल किसी एक जाति की चिंता नहीं, बल्कि पूरे हिंदू समाज और भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रश्न बन चुका है। भारतवर्ष की सांस्कृतिक, धार्मिक और दार्शनिक चेतना में ब्राह्मणों की भूमिका सदियों से केंद्रीय रही है। वेदों की रचना, उपनिषदों की व्याख्या, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों का संरक्षण, मंदिरों की परंपरा, और शिक्षा व्यवस्था का संचालन – ये सब ब्राह्मणों ने हजारों वर्षों तक बिना किसी स्वार्थ के किया। देश को जब जरूरत पड़ी तो  हथियार भी उठाए। देश की स्वतंत्रता के प्रथम व दिवतीय आंदोलन में ब्राह्मणों की अग्रणी भूमिका रही है। अखंड भारत का सपना देखकर उसे साकार कराने वाले भी एक ब्राह्मण चाणक्य थे। सनातन धर्म की पताका को फिर से फहराने वाले भी एक ब्राह्मण आदि शंकराचार्य की थे।

इसके बावजूद, आज वही ब्राह्मण वर्ग देश की विभिन्न वैचारिक और राजनीतिक शक्तियों के निशाने पर है।

यह विरोध कोई आकस्मिक सामाजिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि एक दीर्घकालिक, सुनियोजित और बहुस्तरीय वैचारिक युद्ध है। ब्राह्मण विरोध के नाम पर दरअसल एक व्यापक प्रयास हो रहा है – सनातन धर्म की आत्मा को समाप्त करने का। क्योंकि ब्राह्मण सनातन परंपरा के संरक्षक माने जाते हैं, इसलिए यदि इन्हें बदनाम कर समाज में हाशिए पर ला दिया जाए, तो पूरा सनातन ढांचा अपने-आप ढह जाएगा।

भारतवर्ष की सांस्कृतिक, धार्मिक और दार्शनिक चेतना में ब्राह्मणों की भूमिका सदियों से केंद्रीय रही है। वेदों की रचना, उपनिषदों की व्याख्या, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों का संरक्षण, और भारत की शिक्षा, परंपरा तथा धर्म की धुरी बनने का श्रेय इन्हीं को जाता है। परंतु विडंबना यह है कि आज के भारत में वही ब्राह्मण वर्ग, जो सनातन संस्कृति का वाहक रहा है, अनेक वैचारिक और राजनीतिक शक्तियों के निशाने पर है। आइए, इस वीडियो में हम यह समझने का प्रयास करें कि **ब्राह्मणों को क्यों टारगेट किया जा रहा है**, और इसके पीछे कौन-कौन से विचारधारात्मक एवं राजनीतिक खेल काम कर रहे हैं। ब्राह्मण विरोध कोई अचानक उत्पन्न भावना नहीं है, बल्कि यह एक दीर्घकालीन, संगठित और वैश्विक वैचारिक आक्रमण है। इसका उद्देश्य केवल किसी जाति का विरोध नहीं, बल्कि **सनातन धर्म की मूल आत्मा पर प्रहार** करना है, क्योंकि ब्राह्मण सनातन परंपरा के संरक्षक माने जाते हैं।

 

इसलिए भारत को हिंदू विहीन बनाने के लिए धर्म की रीढ़ माने जाने वाले ब्राह्मण निशाने पर हैं। इस  विराध के पीछे चार प्रमुख शक्तियाँ सक्रिय हैं। पहली शक्ति है नव बौद्ध अंबेडकरवादी आंदोलन, जो डॉ. भीमराव अंबेडकर की विचारधारा के एक विकृत और राजनीतिक रूप से उपयोगी संस्करण के रूप में उभरा है। इस विचारधारा ने 'ब्राह्मणवाद' को संपूर्ण ब्राह्मण जाति के अपराधीकरण के रूप में प्रस्तुत किया है। शास्त्रों की मनमानी व्याख्या, मनुस्मृति जलाने जैसे आयोजन, और “ब्राह्मणों ने ही तुम्हें शूद्र बनाया” जैसे नारे इस आंदोलन का हिस्सा हैं। इसका अंतिम उद्देश्य है हिंदू समाज को जातीय टुकड़ों में बांटना और राजनीतिक सत्ता हथियाना।

दूसरी शक्ति इस्लामी कट्टरवाद है, जो मध्यकाल से ही ब्राह्मणों को ‘काफिरों के पुरोहित’ मानकर पहला निशाना बनाता आया है। आज भी सोशल मीडिया पर, और ज़मीन पर भी, ब्राह्मणों को निशाना बनाया जाता है – क्योंकि इन्हीं के पास धर्म का ज्ञान, आचार का आधार और समाज को संगठित रखने की क्षमता है। मुस्लिम बहुल इलाकों में यज्ञों, हवनों, मंदिर आयोजनों में ब्राह्मणों को धमकाया जाता है या उनका अपमान किया जाता है। ब्राह्मण का अर्थ है वेद, यज्ञ, गीता और मंदिर – और यही सब इस्लामी जेहाद के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट हैं।

तीसरी शक्ति है ईसाई मिशनरियों की धर्मांतरण एजेंसियाँ, जो भारत के आदिवासी और दलित क्षेत्रों में सक्रिय हैं। इन मिशनरियों को ब्राह्मण इसलिए खटकते हैं, क्योंकि वे सनातन धर्म की व्याख्या करते हैं, लोगों में धार्मिक जागरूकता लाते हैं और धर्मांतरण के विरुद्ध शास्त्रीय बोध जगाते हैं। इसलिए मिशनरियाँ ब्राह्मणों को “ढोंगी”, “पाखंडी”, “शोषक” जैसे विशेषणों से बदनाम करती हैं। ये प्रचार केवल चर्च में नहीं, बल्कि NGO, अंतरराष्ट्रीय फंडेड संगठनों, स्कूल पाठ्यक्रमों, और फिल्म-टीवी के माध्यम से समाज में भर दिया गया है। यह एक सुनियोजित प्रयास है कि ब्राह्मण को अपराधी बताकर लोगों में आत्मग्लानि पैदा की जाए, ताकि वे धर्म छोड़ने को तैयार हो जाएँ।

चौथी शक्ति वामपंथी विचारधारा है, जो ब्राह्मणों को “शोषक वर्ग” और “धार्मिक अत्याचार का प्रतीक” कहकर अपने मार्क्सवादी नैरेटिव को भारतीय संदर्भ में फिट करती है। वामपंथियों का उद्देश्य है भारत की सांस्कृतिक पहचान को समाप्त करना और एक धर्मविहीन, परंपराहीन समाज बनाना। JNU, Jadavpur, और अन्य विश्वविद्यालयों में ब्राह्मण विरोध एक फैशनेबल विमर्श बन चुका है। वहाँ इतिहास को तोड़-मरोड़कर यह बताया जाता है कि ब्राह्मणों ने सदियों तक अन्य जातियों को दास बना कर रखा।

इन सबके अतिरिक्त फिल्म, मीडिया और साहित्य भी अब इस ब्राह्मण विरोधी अभियान के सहयोगी बन चुके हैं। फिल्मों में ब्राह्मणों को अक्सर पाखंडी, बलात्कारी, अत्याचारी या राजनीतिक अपराधी के रूप में दिखाया जाता है। आश्रम जैसी वेब सीरीज़, PK और OMG जैसी फिल्में केवल मनोरंजन नहीं हैं, बल्कि यह सब सामाजिक मानस को ब्राह्मण-विरोधी बनाने की रणनीति का हिस्सा है। मीडिया डिबेट्स में भी पंडितों का मज़ाक बनाना, कर्मकांड को अंधविश्वास बताना आम हो गया है।

अब प्रश्न उठता है – क्या ब्राह्मणों ने कभी अन्याय नहीं किया? क्या ब्राह्मण आलोचना के परे हैं? उत्तर है – नहीं। यदि इतिहास में कुछ अपवाद रहे भी हैं, तो वह किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रहा। कोई भी सामाजिक व्यवस्था पूर्ण नहीं होती, परंतु संपूर्ण ब्राह्मण समाज को "शोषक" कहना न केवल ऐतिहासिक रूप से अनुचित है, बल्कि यह सामाजिक न्याय की मूल भावना के विरुद्ध भी है। ब्राह्मणों ने बिना पारिश्रमिक के गुरुकुल चलाए, समाज को आयुर्वेद, खगोल, गणित और दर्शन जैसी विद्याएं सिखाईं, बिना किसी राज्याश्रय या भौतिक लाभ के वेदों का संरक्षण किया। क्या यह सेवा नहीं?

ब्राह्मण विरोध की यह वैचारिक बाढ़ केवल संगठनों की देन नहीं है, बल्कि समाज के भीतर जातीय हीनभावना को भी इसमें भड़काया गया है। वर्षों से समाज में कुछ वर्गों को यह बताया गया कि “ब्राह्मणों ने तुम्हें गुलाम बनाया”, “उन्होंने शिक्षा से वंचित किया”, “तुम्हारा धर्म तुम्हारा नहीं है, यह ब्राह्मणों का है” – यह भावनात्मक झूठ जब बार-बार दोहराया गया, तो वह कई जातियों में सत्य जैसा प्रतीत होने लगा। कुछ राजनीतिक दलों ने इस झूठ को वोट बैंक की रणनीति बना लिया। “ब्राह्मण राज खत्म करो”, “ब्राह्मणवाद हटाओ” जैसे नारे जातीय ध्रुवीकरण के हथियार बन गए। इसमें अनेक जातियों को यह समझाया गया कि जब तक ब्राह्मण हैं, तुम पिछड़े रहोगे।

कुछ शक्तिशाली ओबीसी जातियाँ भी अब इस विचार को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही हैं। यादव, कुर्मी, जाट जैसी जातियाँ – जो अब राजनीतिक शक्ति के शीर्ष पर हैं – वे चाहती हैं कि ब्राह्मण हटा दिया जाए और उनकी जाति नया वैचारिक नेतृत्व करे। इसके लिए पुराने ब्राह्मण विरोधी नैरेटिव का उपयोग हो रहा है, और ब्राह्मणों को “पुराने प्रभु वर्ग” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है जिसे हटाकर “नए नेतृत्व” को स्थापित किया जाए।

ब्राह्मणों ने सदैव सहिष्णुता और त्याग की नीति अपनाई। उन्होंने कभी प्रतिरोध नहीं किया, अपने निजी हितोंके लिए कभी हथियार नहीं उठाया, कभी आंदोलन नहीं किया। यही कारण है कि विरोधियों को यह वर्ग सबसे आसान निशाना लगा। जब ब्राह्मण चुप रहे, सहन करते रहे – तो विरोधियों को यह आत्मविश्वास मिला कि ब्राह्मण को टारगेट करने में कोई जोखिम नहीं। लेकिन समाज यह भूल गया कि यह चुप्पी कमजोरी नहीं, तपस्या थी।

दुख की बात यह है कि अब ब्राह्मणों का विरोध केवल बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से भी हो रहा है। वही जातियाँ जो सनातन धर्म से पोषित हुईं, अब ब्राह्मणों को शत्रु मानकर उस शाखा को काट रही हैं जिस पर वे खुद बैठी हैं। वे नहीं जानतीं कि ब्राह्मणों के हटने का अर्थ है – मंदिरों का मौन हो जाना, यज्ञों का समाप्त हो जाना, वेदों का विलुप्त हो जाना, और धर्म का खंड-खंड हो जाना।

यदि ब्राह्मणों का अस्तित्व मिटा दिया गया, तो जो शून्य बचेगा उसमें मिशनरियाँ, जेहादी, और वामपंथी ताकतें प्रवेश करेंगी। यह ब्राह्मण विरोध नहीं, भारत की सांस्कृतिक आत्महत्या है। यही कारण है कि अब समय आ गया है जब समाज को आत्मचिंतन करना चाहिए। ब्राह्मणों को मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए, उन्हें दुश्मन मानना बंद होना चाहिए। अन्य हिंदू जातियों को यह समझना होगा कि ब्राह्मण विरोध दरअसल उनकी अपनी धार्मिक विरासत के विरोध का माध्यम है।

इसलिए अब हर जाति को उठना होगा – सनातन की रक्षा के लिए, ब्राह्मणों के सम्मान के लिए, और भारत की आत्मा को जीवित रखने के लिए। ब्राह्मणों की रक्षा, केवल एक जाति की नहीं, बल्कि पूरे धर्म और संस्कृति की रक्षा है। यदि हम ऐसा न कर पाए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें एक ऐसे समाज के रूप में याद करेंगी जिसने स्वयं अपनी जड़ों को काट डाला।


 

Saturday, March 27, 2021

 दिल्ली में गढ़वाली लोगों का आना 1940 के आस-पास हुआ और कुमाऊं के लोग दूसरे विश्व युद्ध के समाप्त होने और बाद में देश आजाद होने के बाद बड़ी संख्या में दिल्ली आने शुरू हुए।

Saturday, October 11, 2014

Climate change: Melting himalayi glaciers

Running 2,000 kilometres from east to west and comprising more than 60,000 square kilometres of ice, the Hindu Kush–Karakoram–Himalayan glaciers are a source of water for the quarter of the global population that lives in south Asia. Glaciers are natural stores and regulators of water supply to rivers, which, in turn, provide water for domestic and industrial consumption, energy generation and irrigation.
Ice cover is decreasing in this region, as for most glaciers in the world, as a result of global warming. Between 2003 and 2009, Himalayan glaciers lost an estimated 174 gigatonnes of water1, and contributed to catastrophic floods of the Indus, Ganges and Brahmaputra rivers. Pollution is accelerating the melt. An 'Asian brown cloud', formed from the 2 million tonnes of soot and dark particles released into the atmosphere every year, mostly from India and China, warms the air and surface ice2.
Seasonal meltwater serves as the main source of power for an increasing number of hydroelectric dams on the rivers served by the glaciers. But hydropower faces a difficult future in south Asia because of climatic, environmental and politico-economic factors. The region is starved of energy, and power shortages of up to 20 hours a day are stunting development. Importing oil and gas from the Gulf, Iran or Tajikistan is expensive or politically difficult. So countries are turning to indigenous hydroelectric power, and to other renewable energies such as solar and wind, for cheap, sustainable energy.
Hydroelectric power must play a part in south Asia's low-carbon energy future. But to be effective, governments around the Himalayas need to work together to measure and model glacier retreat, changing river flows and their impact on hydroelectric power generation. Political obstacles to dam construction and watershed management must also be overcome.

Glacial retreat

Glaciers feed thousands of miles of rivers in Pakistan. The largest, the river Indus, depends on glacial waters for up to half of its flow. But near the river's source, in mountains in the Indian-administered state of Jammu and Kashmir, the glaciers are thinning at an alarming rate of 0.7 metres per year3. The Ganges and Brahmaputra rivers in India and Bangladesh are similarly threatened by glacial melting in the regions of their headwaters4.
Modelling of glacier retreat in the Himalayas is hindered by sparse data. Field, satellite and weather records confirm that 9% of the ice area present in the early 1970s had disappeared by the early 2000s (ref. 5). But there has been no comprehensive assessment of current regional mass balance — the difference between the accumulation of ice and its loss3.
An increased seasonal melt coupled with rains will bring more intense floods, such as those in 2010 caused by excessive monsoon rains that inundated one-fifth of Pakistan's land area for five weeks, killing 2,000 people and costing tens of billions of dollars in damage and economic impact. Sea level is rising at around 3.5 millimetres per year5 and the frequency of tropical cyclones is predicted to increase as a result of global warming. Because rain, rather than snow, falls on mountains in spring, river flows will peak before the main growing season. Summers will increasingly see dry streams, withered and abandoned crops, dead fish and low groundwater levels.

... From--http://www.nature.com/news/climate-change-melting-glaciers-bring-energy-uncertainty-1.14031

Sunday, May 15, 2011

हरिद्वार नहीं कानपुर व बनारस में करो गंगा को निर्मल उमा जी!


हरिद्वार नहीं कानपुर व बनारस में करो गंगा को निर्मल उमा जी!
उत्तराखंड में नहीं यूपी से लेकर गंगा सागर तक मैली है गंगा

गंगा को लेकर एक बार फिर से राजनीति शुरू हो गई है। डा. बीडी अग्रवाल के बाद अब साध्वी उमा भारती गंगा को लेकर हरिद्वार में अनशन पर हैं। वे गंगा पर प्रस्तावित सभी हाइड्रोप्रोजक्ट की समीक्षा करने तथा श्रीनगर क्षेत्र के हाइड्रो प्रोजेक्ट से धारी देवी मंदिर को बचाने की मांग कर रही हैं। यानी कहें तो वे भी गंगा की निर्मल धारा के पक्ष में हैं। हम हिमालयवासी व हमारे पुरखे भी यही चाहते रहे हैं व प्रयास करते रहे हैं। हमारे प्रयासों का नतीजा है कि उत्तराखंड में गंगा आज भी उतनी ही निर्मल है जितनी भगवान ब्रह्मा के कमंडल से निकल कर गंगा भगवान शिव की जटाओं पर बिखरी व उन्होंने महाराज भगीरथ को सौंपी थी। इसलिए अग्रवाल और उमा भारती जैसे गंगा प्रेमियों को गंगा की उत्तराखंड में नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल में धरना-प्रदर्शन करना चाहिए, जहां गंगा आज मैली होकर गंदे नाले में बदल चुकी है।
सवाल यह है कि आखिर हर आंदोलनकारी उत्तराखंड की ओर क्यों मुख कर लेता है। कभी कानपुर, बनारस, प्रयाग, पटना, कोलकाता आदि शहरों में कोई धरना नहीं देता? सिर्फ उत्तराखंडियों के पेट पर लात मारने के लिए ये गंगा प्रेमी वहां क्यों पहुंच जाते हैं। वे केंद्र सरकार से क्यों नहीं पूछते कि गगां और यमुना को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए बनी कार्ययोजनाएं क्यों फेल हो गईं। करोड़ों रुपये कौन डकार गया।
इसलिए उमा जी ,हरिद्वार नहीं कानपुर में धरना दो जहां चमड़े के लिए कारखानों में गाय-बैल काटे जा रहे हैं और उसका गंदा गंगा में डाला जा रहा है। दिल्ली में यमुना भी नाला बन गई है।
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राष्ट्रीय नदी घोषित करने पर भी मैली है गंगा
बात ९० के दशक के शुरूआदी दौर की है। उत्तराखंड के चमोली जिले से कई सामाजिक कार्यकर्ता दिल्ली में किसी मुद्दे पर धरना देने आए थे। उनमें कुछ मद्दिद्दद्दहलाएं भी शामिल थीं। धरना स्थल पर पहुंचे पत्रकारों ने देखा कि एक मङ्क्षहला रो रही है। पत्रकारों ने रोने का कारण पूछा। जो जवाब मिला वह अनोखा तो था ही रायसीना हिल्स पर बैठे राजनेताओं की आंख व कान खोलने के लिए काफी था। द्दमहिला ने कहा- 'मैं अभी यमुना नदी पार करके आई हूं। उसे देखकर रोएं नहीं तो क्या करें। हमारी यमुना यहां गंदा नाला बना दी गई है। हमने तो गंगा- यमुना को उसी उम्मीद से मैदानों में भेजा जैसे अपनी बेटियों को ससुराल भेजते हैं कि उनके ससुराली उसे प्यार से रखेंगे। लेकिन मैदानों में तो गंगा-यमुना को नाला बना दिया है। उन्हें मार ही दिया है। हमारी बेटियों की यह दुर्दशा क्यों कर दी गई।झ् यह कहकर वह फिर रोने लगी थीं।
इसी तरह बात वर्ष १८ अगस्त, २००९ की बात है। विज्ञान भवन में राज्यों के वन मंत्रियों के सम्मेलन चल रहा था। केन्द्रीय पर्यावरण व वन राज्यमंत्री(स्वतंत्र प्रभार) जयराम रमेश ने मंच से उत्तर प्रदेश के एक अफसर से पूछा- 'गंगा पर पिछले २० साल में ९५० करोड़ रुपये खर्च करने के बाद आलोक रंजन क्या आप गंगा को पहले से साफ कह सकते हैं। जयराम के इस सवाल पर उत्तर प्रदेश के आला अफसर आलोक पहले तो सकुचाए लेकिन मंत्री के जोर देने पर उनका जवाब था-नहीं।झ्
गंगा-यमुना को प्रदूषण मुक्त बनाने के प्रयासों की पोल खोलने के लिए यह 'नहींझ् शब्द काफी था। जयराम ने माना कि यमुना पर भी ८०० करोड़ खर्च किये जा चुके हैं,लेकिन यमुना नाला बन गई है। उन्होंने राज्यों से यह भी कहा कि आकड़े मत दीजिए। यह बताइए कि क्या आम आदमी गंगा और यमुना को साफ सुथरी कह सकता है। आम आदमी जब इन नदियों को साफ कहना शुरू करेगा तभी इन्हें साफ माना जाएगा। जयराम ने इसके बाद सम्मेलन में मौजूद उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के तत्कालीन वनमंत्रियों से भी पूछा कि इन नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए पुराने तौर तरीकों की बजाए कौन से नये तरीके अपनाए जा सकते हैं। सरकार लगभग हर बार संसद में कहती रही है कि गंगा और यमुना को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कई कार्ययोजनाएं शुरू की गईं। इनके अलावा राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के तहत अन्य ३७ प्रमुख नदियों को भी प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए केंद्र आर्थिक मदद मुहैया कराता है। इनके लिए ४३९१.८३ करोड़ रुपये दिये जा चुके हैं। इसके बावजूद ज्यादातर नदियां अब नाला बन गई हैं। दिल्ली में आज भी यमुना के पानी में अपनी तस्वीर देख पाना तो दूर उसके किनारे बैठ पाना भी संभव नहीं हैं। क्योंकि वहां की गंदगी से बदबू आती है। यह हालत तब है जब हम नदियों की पूजा भी करते हैं।
दूसरी तरफ देश की सबसे बड़ी दो पार्टियां गंगा साफ सुथरी बनाने की बजाए राजनीति कर रही हैं। केंद्र की यूपीए सरकार गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर चुकी हैं और उत्तराखंड सरकार यूनेस्को से गंगा को विश्व धरोहर घोषित कराने की कोशिश में है। उत्तराखंड सरकार ने यूनेस्को से कहा है कि गंगा भारत के करोड़ों लोगों की आस्था व जीवन का केंद्र है। विश्व धरोहर बनाने से गंगा के प्रति पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित होगा। इसके अलावा उत्तराखंड सरकार ने भी हाल में गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए 'स्पर्श गंगाझ् कार्यक्रम शुरू किया है। जबकि केंद्र की यूपीए सरकार गंगा को पहले ही राष्ट्रीय नदी घोषित कर चुकी है और गंगा को निर्मल बनाने के लिए गंगा नदी घाटी प्राधिकरण भी गठित कर चुकी है। हालांकि ढाई दशक बीच जाने और इस अवधि में नौ सौ करोड़ रुपये खर्च करने पर भी गंगा पहले से ज्यादा मैली हो चुकी है। इस मैली गंगा को अब वर्ष २०२० तक प्रदूषण मुक्त बनाने का नया लक्ष्य तय किया गया है। इसके लिए राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण की पहल पर मिशन गंगा चलाया जा रहा है। मिशन के दायरे में गंगा की प्रमुख सहायक नदियों यमुना, रामगंगा, चंबल, टोंस-कर्मनासा, गोमती-घाघरा,गंडक-बढ़ी गंडक,कोदी-महानंदा आदि की भी सुध ली जाएगी।
सरकार भगीरथी पर तीन परियोजनाओं लोहारीनाग पाला, भैरों घाटी और पाला मनेरी को पहले हर ठंडे बस्ते में डाल चुकी है। गोमुख से उत्तरकाशी तक १३० किलोमीटर तक भागीरथी की धारा को अविरल बहने देने के लिए उस क्षेत्र को इको संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया जा चुका है। केंद्र की योजना के अनुसार अब वर्ष २०२० के बाद कोई भी स्थानीय निकाय और औद्योगिक इकाई अपनी गंदगी बिना ट्रीट किए गंगा में नहीं डाल पाएगा। अब नदियों के किनारे बसे शहरों की बजाए नदी घाटी को केन्द्र में रख कर योजनाएं बनेंगी और उन पर प्राधिकरण अमल कराएगा। उत्तराखंड सरकार की ४८० मेगावाट की भैराघाटी परियोजना और ३८० मेगावाट की पाला मनेरी के अलावा एनटीपीसी की ६०० मेगावाट क्षमता की लोहारीनाग पाला परियोजना को बंद करने के फैसले पर भी मुहर लग चुकी है।
इससे उम्मीद की जानी चाहिए कि गंगा-यमुना समेत हिमालयी नदियों के दिन एक दिन जरूर फिरेंगे।

Sunday, March 20, 2011

तब चेहरे पर पोतने के लिए रंग नहीं थे पर मन उमंग से भरे ----

होली की शुभकामनाएं
--------तब हमारे पास चेहरे पर पोतने के लिए रंग नहीं थे पर हमारे मन भारी उमंग से भरे होते थे----


उत्तराखंड के अपने गांव में बचपन की होली आज भी याद है। हम सभी बच्चे सफेद कपड़े पहनकर व टोलियां बनाकर रात में घर-घर जाकर होली गीत गाते थे, एक जोकर भी होता था। ढोलकी बजाते व होली के गीत गाते। प्रत्येक घर से कुछ न कुछ जरूर मिलता था। दादी, चाची, बोडी, काकी, भाभी सभी तो हमें कुछ न कुछ प्यार से हमें देता थे। पैसों तो कम होते थे पर दाल, चावल, गुड़ आदि खूब मिलता था। होली के दिन नदी किनारे जाकर होली में मिले अनाज से खिचड़ी पकाते, दिनभर नहाते व क्रिकेट खेलते।
तब हमारे पास चेहरे पर पोतने के लिए रंग नहीं थे पर हमारे मन भारी उमंग से भरे होते थे।
लेकिन आज दिल्ली जैसे महानगर में रहते हुए रंग तो हैं पर वह उमंग पता नहीं कहां गायब हो गई है।

आखिर क्यों मित्रो?

Monday, January 31, 2011

Movement to be run --------------
Hey Hill People
You keep running
Chipko movement
and save wildlife movement
Even if your farm and forest
Take buy Dhanna Seth of Cities

To break the mountain by Mafia give limestone

Ganga - Yamuna retain the cities sewer
Hey Hill People
You have to save the environment
To protect forest
To protect wildlife
Because you're hill
You do not need
Roads, electricity, water, hospitals and industry
Wood for fuel
For animal feed
You are a resident of Dev Bhoomi
God will save you
You keep running
Movement and movement
Regardless of your children
Kill by tigers, leopards and bears
because It is only your duty

To protect Himalaya and Ganga

(News – In sundarkhal, near Jim Corbett National Park a cannibalistic tigere killed and ate five people, Which eventually killed)

Sunday, January 30, 2011

आंदोलन चलाने रहना--------------

अरे पहाड़ी जन
तुम चलाने रहना
कभी चिपको आंदोलन
कभी वन्यजीव बचाओ आन्दोलन

भले ही तुम्हारे खेत व जंगलों को
खरीद ले शहरों के धन्ना सेठ
माफिया तोड़ दे चूना पत्थर के लिए पहाड़
गंगा-यमुना को शहरों में बना दें गंदा नाला

अरे पहाड़ी जन
तुम्हें तो बचाना है पर्यावरण
बचाने हैं जंगल
बचाने हैं वन्य जीव
क्योंकि तुम पहाड़ी हो
तुम्हें नहीं चाहिए
सड़क, बिजली, पानी, अस्पताल और उद्योग
ईंधन के लिए लकडी
पशुओं के लिए चारा

तुम तो निवासी हो देव भूमि के
तुम्हें बचा लेंगे देवता
तुम चलाते रहना
आंदोलन पर आंदोलन
भले ही तुम्हारी संतानों को
मार डाले बाघ, तेंदुआ व रीछ
क्योंकि तुम पहाड़ीजनों का ही है
हिमालय और गंगा को बचाने का ठेका

(खबर- जिम कार्बेट नेशनल पार्क के निकट सुंदरखाल में एक नरभक्षी बाघ ढाई माह के दौरान पांच लोगों का मार कर खा गया। जिसे आखिरकार मार डाला गया)

भारत में सभी के निशाने पर क्यों हैं ब्राह्मण ? Why are Brahmins the target of everyone in India?

      भारत में ब्राह्मण सभी के निशाने पर क्यों हैं ?  - डा. हरीश चंद्र लखेड़ा  (  Dr. Harish Chandra Lakhera ) भारत में ब्राह्मण सभी...