होली की शुभकामनाएं
--------तब हमारे पास चेहरे पर पोतने के लिए रंग नहीं थे पर हमारे मन भारी उमंग से भरे होते थे----
उत्तराखंड के अपने गांव में बचपन की होली आज भी याद है। हम सभी बच्चे सफेद कपड़े पहनकर व टोलियां बनाकर रात में घर-घर जाकर होली गीत गाते थे, एक जोकर भी होता था। ढोलकी बजाते व होली के गीत गाते। प्रत्येक घर से कुछ न कुछ जरूर मिलता था। दादी, चाची, बोडी, काकी, भाभी सभी तो हमें कुछ न कुछ प्यार से हमें देता थे। पैसों तो कम होते थे पर दाल, चावल, गुड़ आदि खूब मिलता था। होली के दिन नदी किनारे जाकर होली में मिले अनाज से खिचड़ी पकाते, दिनभर नहाते व क्रिकेट खेलते।
तब हमारे पास चेहरे पर पोतने के लिए रंग नहीं थे पर हमारे मन भारी उमंग से भरे होते थे।
लेकिन आज दिल्ली जैसे महानगर में रहते हुए रंग तो हैं पर वह उमंग पता नहीं कहां गायब हो गई है।
आखिर क्यों मित्रो?
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