Sunday, May 15, 2011

हरिद्वार नहीं कानपुर व बनारस में करो गंगा को निर्मल उमा जी!


हरिद्वार नहीं कानपुर व बनारस में करो गंगा को निर्मल उमा जी!
उत्तराखंड में नहीं यूपी से लेकर गंगा सागर तक मैली है गंगा

गंगा को लेकर एक बार फिर से राजनीति शुरू हो गई है। डा. बीडी अग्रवाल के बाद अब साध्वी उमा भारती गंगा को लेकर हरिद्वार में अनशन पर हैं। वे गंगा पर प्रस्तावित सभी हाइड्रोप्रोजक्ट की समीक्षा करने तथा श्रीनगर क्षेत्र के हाइड्रो प्रोजेक्ट से धारी देवी मंदिर को बचाने की मांग कर रही हैं। यानी कहें तो वे भी गंगा की निर्मल धारा के पक्ष में हैं। हम हिमालयवासी व हमारे पुरखे भी यही चाहते रहे हैं व प्रयास करते रहे हैं। हमारे प्रयासों का नतीजा है कि उत्तराखंड में गंगा आज भी उतनी ही निर्मल है जितनी भगवान ब्रह्मा के कमंडल से निकल कर गंगा भगवान शिव की जटाओं पर बिखरी व उन्होंने महाराज भगीरथ को सौंपी थी। इसलिए अग्रवाल और उमा भारती जैसे गंगा प्रेमियों को गंगा की उत्तराखंड में नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल में धरना-प्रदर्शन करना चाहिए, जहां गंगा आज मैली होकर गंदे नाले में बदल चुकी है।
सवाल यह है कि आखिर हर आंदोलनकारी उत्तराखंड की ओर क्यों मुख कर लेता है। कभी कानपुर, बनारस, प्रयाग, पटना, कोलकाता आदि शहरों में कोई धरना नहीं देता? सिर्फ उत्तराखंडियों के पेट पर लात मारने के लिए ये गंगा प्रेमी वहां क्यों पहुंच जाते हैं। वे केंद्र सरकार से क्यों नहीं पूछते कि गगां और यमुना को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए बनी कार्ययोजनाएं क्यों फेल हो गईं। करोड़ों रुपये कौन डकार गया।
इसलिए उमा जी ,हरिद्वार नहीं कानपुर में धरना दो जहां चमड़े के लिए कारखानों में गाय-बैल काटे जा रहे हैं और उसका गंदा गंगा में डाला जा रहा है। दिल्ली में यमुना भी नाला बन गई है।
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राष्ट्रीय नदी घोषित करने पर भी मैली है गंगा
बात ९० के दशक के शुरूआदी दौर की है। उत्तराखंड के चमोली जिले से कई सामाजिक कार्यकर्ता दिल्ली में किसी मुद्दे पर धरना देने आए थे। उनमें कुछ मद्दिद्दद्दहलाएं भी शामिल थीं। धरना स्थल पर पहुंचे पत्रकारों ने देखा कि एक मङ्क्षहला रो रही है। पत्रकारों ने रोने का कारण पूछा। जो जवाब मिला वह अनोखा तो था ही रायसीना हिल्स पर बैठे राजनेताओं की आंख व कान खोलने के लिए काफी था। द्दमहिला ने कहा- 'मैं अभी यमुना नदी पार करके आई हूं। उसे देखकर रोएं नहीं तो क्या करें। हमारी यमुना यहां गंदा नाला बना दी गई है। हमने तो गंगा- यमुना को उसी उम्मीद से मैदानों में भेजा जैसे अपनी बेटियों को ससुराल भेजते हैं कि उनके ससुराली उसे प्यार से रखेंगे। लेकिन मैदानों में तो गंगा-यमुना को नाला बना दिया है। उन्हें मार ही दिया है। हमारी बेटियों की यह दुर्दशा क्यों कर दी गई।झ् यह कहकर वह फिर रोने लगी थीं।
इसी तरह बात वर्ष १८ अगस्त, २००९ की बात है। विज्ञान भवन में राज्यों के वन मंत्रियों के सम्मेलन चल रहा था। केन्द्रीय पर्यावरण व वन राज्यमंत्री(स्वतंत्र प्रभार) जयराम रमेश ने मंच से उत्तर प्रदेश के एक अफसर से पूछा- 'गंगा पर पिछले २० साल में ९५० करोड़ रुपये खर्च करने के बाद आलोक रंजन क्या आप गंगा को पहले से साफ कह सकते हैं। जयराम के इस सवाल पर उत्तर प्रदेश के आला अफसर आलोक पहले तो सकुचाए लेकिन मंत्री के जोर देने पर उनका जवाब था-नहीं।झ्
गंगा-यमुना को प्रदूषण मुक्त बनाने के प्रयासों की पोल खोलने के लिए यह 'नहींझ् शब्द काफी था। जयराम ने माना कि यमुना पर भी ८०० करोड़ खर्च किये जा चुके हैं,लेकिन यमुना नाला बन गई है। उन्होंने राज्यों से यह भी कहा कि आकड़े मत दीजिए। यह बताइए कि क्या आम आदमी गंगा और यमुना को साफ सुथरी कह सकता है। आम आदमी जब इन नदियों को साफ कहना शुरू करेगा तभी इन्हें साफ माना जाएगा। जयराम ने इसके बाद सम्मेलन में मौजूद उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के तत्कालीन वनमंत्रियों से भी पूछा कि इन नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए पुराने तौर तरीकों की बजाए कौन से नये तरीके अपनाए जा सकते हैं। सरकार लगभग हर बार संसद में कहती रही है कि गंगा और यमुना को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कई कार्ययोजनाएं शुरू की गईं। इनके अलावा राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के तहत अन्य ३७ प्रमुख नदियों को भी प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए केंद्र आर्थिक मदद मुहैया कराता है। इनके लिए ४३९१.८३ करोड़ रुपये दिये जा चुके हैं। इसके बावजूद ज्यादातर नदियां अब नाला बन गई हैं। दिल्ली में आज भी यमुना के पानी में अपनी तस्वीर देख पाना तो दूर उसके किनारे बैठ पाना भी संभव नहीं हैं। क्योंकि वहां की गंदगी से बदबू आती है। यह हालत तब है जब हम नदियों की पूजा भी करते हैं।
दूसरी तरफ देश की सबसे बड़ी दो पार्टियां गंगा साफ सुथरी बनाने की बजाए राजनीति कर रही हैं। केंद्र की यूपीए सरकार गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर चुकी हैं और उत्तराखंड सरकार यूनेस्को से गंगा को विश्व धरोहर घोषित कराने की कोशिश में है। उत्तराखंड सरकार ने यूनेस्को से कहा है कि गंगा भारत के करोड़ों लोगों की आस्था व जीवन का केंद्र है। विश्व धरोहर बनाने से गंगा के प्रति पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित होगा। इसके अलावा उत्तराखंड सरकार ने भी हाल में गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए 'स्पर्श गंगाझ् कार्यक्रम शुरू किया है। जबकि केंद्र की यूपीए सरकार गंगा को पहले ही राष्ट्रीय नदी घोषित कर चुकी है और गंगा को निर्मल बनाने के लिए गंगा नदी घाटी प्राधिकरण भी गठित कर चुकी है। हालांकि ढाई दशक बीच जाने और इस अवधि में नौ सौ करोड़ रुपये खर्च करने पर भी गंगा पहले से ज्यादा मैली हो चुकी है। इस मैली गंगा को अब वर्ष २०२० तक प्रदूषण मुक्त बनाने का नया लक्ष्य तय किया गया है। इसके लिए राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण की पहल पर मिशन गंगा चलाया जा रहा है। मिशन के दायरे में गंगा की प्रमुख सहायक नदियों यमुना, रामगंगा, चंबल, टोंस-कर्मनासा, गोमती-घाघरा,गंडक-बढ़ी गंडक,कोदी-महानंदा आदि की भी सुध ली जाएगी।
सरकार भगीरथी पर तीन परियोजनाओं लोहारीनाग पाला, भैरों घाटी और पाला मनेरी को पहले हर ठंडे बस्ते में डाल चुकी है। गोमुख से उत्तरकाशी तक १३० किलोमीटर तक भागीरथी की धारा को अविरल बहने देने के लिए उस क्षेत्र को इको संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया जा चुका है। केंद्र की योजना के अनुसार अब वर्ष २०२० के बाद कोई भी स्थानीय निकाय और औद्योगिक इकाई अपनी गंदगी बिना ट्रीट किए गंगा में नहीं डाल पाएगा। अब नदियों के किनारे बसे शहरों की बजाए नदी घाटी को केन्द्र में रख कर योजनाएं बनेंगी और उन पर प्राधिकरण अमल कराएगा। उत्तराखंड सरकार की ४८० मेगावाट की भैराघाटी परियोजना और ३८० मेगावाट की पाला मनेरी के अलावा एनटीपीसी की ६०० मेगावाट क्षमता की लोहारीनाग पाला परियोजना को बंद करने के फैसले पर भी मुहर लग चुकी है।
इससे उम्मीद की जानी चाहिए कि गंगा-यमुना समेत हिमालयी नदियों के दिन एक दिन जरूर फिरेंगे।

Sunday, March 20, 2011

तब चेहरे पर पोतने के लिए रंग नहीं थे पर मन उमंग से भरे ----

होली की शुभकामनाएं
--------तब हमारे पास चेहरे पर पोतने के लिए रंग नहीं थे पर हमारे मन भारी उमंग से भरे होते थे----


उत्तराखंड के अपने गांव में बचपन की होली आज भी याद है। हम सभी बच्चे सफेद कपड़े पहनकर व टोलियां बनाकर रात में घर-घर जाकर होली गीत गाते थे, एक जोकर भी होता था। ढोलकी बजाते व होली के गीत गाते। प्रत्येक घर से कुछ न कुछ जरूर मिलता था। दादी, चाची, बोडी, काकी, भाभी सभी तो हमें कुछ न कुछ प्यार से हमें देता थे। पैसों तो कम होते थे पर दाल, चावल, गुड़ आदि खूब मिलता था। होली के दिन नदी किनारे जाकर होली में मिले अनाज से खिचड़ी पकाते, दिनभर नहाते व क्रिकेट खेलते।
तब हमारे पास चेहरे पर पोतने के लिए रंग नहीं थे पर हमारे मन भारी उमंग से भरे होते थे।
लेकिन आज दिल्ली जैसे महानगर में रहते हुए रंग तो हैं पर वह उमंग पता नहीं कहां गायब हो गई है।

आखिर क्यों मित्रो?

Monday, January 31, 2011

Movement to be run --------------
Hey Hill People
You keep running
Chipko movement
and save wildlife movement
Even if your farm and forest
Take buy Dhanna Seth of Cities

To break the mountain by Mafia give limestone

Ganga - Yamuna retain the cities sewer
Hey Hill People
You have to save the environment
To protect forest
To protect wildlife
Because you're hill
You do not need
Roads, electricity, water, hospitals and industry
Wood for fuel
For animal feed
You are a resident of Dev Bhoomi
God will save you
You keep running
Movement and movement
Regardless of your children
Kill by tigers, leopards and bears
because It is only your duty

To protect Himalaya and Ganga

(News – In sundarkhal, near Jim Corbett National Park a cannibalistic tigere killed and ate five people, Which eventually killed)

Sunday, January 30, 2011

आंदोलन चलाने रहना--------------

अरे पहाड़ी जन
तुम चलाने रहना
कभी चिपको आंदोलन
कभी वन्यजीव बचाओ आन्दोलन

भले ही तुम्हारे खेत व जंगलों को
खरीद ले शहरों के धन्ना सेठ
माफिया तोड़ दे चूना पत्थर के लिए पहाड़
गंगा-यमुना को शहरों में बना दें गंदा नाला

अरे पहाड़ी जन
तुम्हें तो बचाना है पर्यावरण
बचाने हैं जंगल
बचाने हैं वन्य जीव
क्योंकि तुम पहाड़ी हो
तुम्हें नहीं चाहिए
सड़क, बिजली, पानी, अस्पताल और उद्योग
ईंधन के लिए लकडी
पशुओं के लिए चारा

तुम तो निवासी हो देव भूमि के
तुम्हें बचा लेंगे देवता
तुम चलाते रहना
आंदोलन पर आंदोलन
भले ही तुम्हारी संतानों को
मार डाले बाघ, तेंदुआ व रीछ
क्योंकि तुम पहाड़ीजनों का ही है
हिमालय और गंगा को बचाने का ठेका

(खबर- जिम कार्बेट नेशनल पार्क के निकट सुंदरखाल में एक नरभक्षी बाघ ढाई माह के दौरान पांच लोगों का मार कर खा गया। जिसे आखिरकार मार डाला गया)

भारत में सभी के निशाने पर क्यों हैं ब्राह्मण ? Why are Brahmins the target of everyone in India?

      भारत में ब्राह्मण सभी के निशाने पर क्यों हैं ?  - डा. हरीश चंद्र लखेड़ा  (  Dr. Harish Chandra Lakhera ) भारत में ब्राह्मण सभी...